Ankit Dhama

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Piece of Bread Story (रोटी का टुकड़ा कहानी)

मै और मेरा दोस्त विजय अपने बी.टेक सेमेस्टर की परीक्षा देकर घर जा रहे थे | हम दोनों को अलग अलग रेलगाड़ी को पकड़ना था, विजय इलाहबाद जा रहा था और मैं दिल्ली जा रहा था | गर्मी अपने पूरे जोरो पर थी क्योंकि ये जून का महीना था सूर्ये देवता हमारा कड़ा इम्तिहान ले रहे थे और हम अभी और कोई परीक्षा देने के मूड में नहीं थे 😀| विजय अपने स्वाभाव के मुताबिक उस भीषण गर्मी में भी सोने का प्रयास कर रहा था और मैं स्टेशन पर अपना टाइम पास करने के लिए दुसरो के स्वाभाव को देख रहा था |

स्टेशन भी अपने आप मैं पुरे देश दुनिया के लोगो के दर्शन करवा देता है और चूँकि हम मथुरा(जो एक धार्मिक स्थल भी है) स्टेशन पर थे तो वहां पर मुझे देश के विभिन्न भागो से आये लोगो के दर्शन प्राप्त हो रहे थे | हमारे से कुछ दूरी पर एक बंगाली परिवार बैठा था जिसमे करीब 6 सदस्य थे | आप किसी भी व्यक्ति का चेहरा देखकर बता सकते है की इस परिवार मे इस व्यक्ति का क्या योगदान होगा मतलब ये वो सदस्य है जो बाहर जाकर कमाता है और घर के काम भी करता है या फिर घर का राजकुमार यानि की निठल्ला सदस्य 😂😂😂 जो पूरा दिन बात बनाता है और आगे जाकर राजा बनने के सपने भी देखता है खैर उस परिवार मै जो सबसे अधेड़ उम्र का सदस्य या यूँ कहे की वो अधेड़ उम्र का लगता था ही वो सदस्य है जिस पर उस परिवार को पालने और उन्हें घुमाने का जिम्मा था खैर बाकि उस परिवार में बच्चे २ बुजुर्ग 2 महिलाएं और दो पुरुष सदस्य थे जो देखने में मिडिल क्लास परिवार से लग रहे थे हमारी तरह 😀|

मैं इसी तरह लोगो को देखकर अपना वक़्त काट रहा था की तभी मुझे लगा कि कोई मेरी शर्ट पीछे से खींच रहा है मैंने पीछे मुड़कर देखा वो एक सात आठ साल का लड़का था जो एक फटी पुरानी शर्ट पहने हुए था इतनी गरम धूप होने के बावजूद उसने पैरो में कुछ नहीं पहना था या फिर ये कहे की शायद उसके पास पैरो में पहनने के लिए कुछ नहीं था | मैंने उसको घूर कर देखा क्योंकि जिस जगह से उसने मेरी शर्ट को खींचा था वहां से वह थोड़ी गन्दी हो थी आदमी का स्वाभाव है छोटी छोटी बातों पर ग़ुस्सा दिखने का तो मैंने भी वही किया मैंने उससे पूछा की उसे क्या चाहिए | मेरे घूरने से वो थोड़ा पीछे की तरफ हो गया था और वही से उसने पहले अपने पेट पर हाथ रखा और फिर अपने मुँह पर ये दिखने के लिए की वह भूखा है | मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और वहां से जो सबसे कम अंक का सिक्का था (2 रुपया) वो उसको दे दिया | वो मेरी तरफ मुस्कुराकर वहां से चला गया उसके बाद उसने कई लोगो से स्टेशन पर उसी तरह पैसे या खाना मांगने का प्रयास किया पर ज्यादातर लोगो ने उसे घुड़ककर भगा दिया | मेरी नज़रो ने उसका बहुत दूर तक पीछा किया जब तक वो मेरी आँखों से ओझल नहीं हो गया |

चूँकि मेरी ट्रैन आने में अभी एक घंटा और था और विजय की ट्रैन आने मे दो घंटे का समय बाकि था तो मैंने भी थोड़ी देर विजय की तरह सोने का विचार बनाया | हमारी बगल में बैठे परिवार ने अब अपना खाने का टिफ़िन निकाल कर रख लिया था भूख तो हमे भी लगी थी मगर किया क्या जा सकता था | सभी विचारो से गर्दन झटककर मैंने अब सोने का प्रयास किया और मैं इस कार्य में कुछ सफल भी हो गया था की अचानक स्टेशन पर मचे शोर से मेरी आँखे खुल गयी मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था की हुआ क्या है कि अचानक स्टेशन पर चोर नाम के शब्द का बम फूटा | सभी लोग चोर चोर चिल्लाकर एक और भागे जा रहे थे | कुछ दूरी पर जाकर भीड़ इकठ्ठा हो गयी और वह से तेज आवाज आ रही थी | विजय भी अब तक जाग चुका था हम लोगो को लगा की चोर पकड़ा जा चुका है और लोग उसी को घेरकर खड़े है इसलिए हम भी उसी और चल दिए | जब मैंने भीड़ के अंदर जाकर देखा तो पता चला की चोर कोई और नहीं बल्कि वही छोटा लड़का है जिसको कुछ देर पहले मैं २ रुपए देकर अपने आप को बहुत दयालु समझ रहा था | कुछ लोगो ने पूछा की इसने चुराया क्या है जवाब उस बच्चे की आंखों ने दिया जो भीड़ की बातों से बेखबर कुछ ढूंढ रही थी जिस के लिए वो स्टेशन पर आया था जिसके लिए उसने चोरी की थी जिसके लिए भीड़ उसे चोर बोलकर उसको मारने के लिए भागी थी और जो अब पूरी तरह से कुचला जा चुका था वो था हमारी बगल में बैठे उसी परिवार के लोगो से चुराया गया वो - रोटी का टुकड़ा

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